भारत-चीन व्यापार असंतुलन: आत्मनिर्भरता की ओर कदम या आर्थिक गुलामी का रास्ता?
भारत और चीन के बीच का व्यापारिक रिश्ता विगत कुछ दशकों में कई मोड़ ले चुका है। एक ओर जहां भारत एक विकासशील राष्ट्र के रूप में वैश्विक व्यापार में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन ने अपनी उत्पादन क्षमता, कम कराधान और रणनीतिक नीतियों के बल पर दुनिया के अधिकांश देशों को व्यापारिक रूप से अपनी ओर खींच लिया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।
—आयात-निर्यात में भारी असंतुलन
वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार भारत का चीन से कुल आयात 101 बिलियन डॉलर से अधिक था, जबकि भारत से चीन को निर्यात केवल 16 बिलियन डॉलर रहा। यह लगभग 85 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा दर्शाता है। यह असंतुलन केवल व्यापारिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी गंभीर चिंता का विषय है।
भारत चीन से मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं, मशीनों के कल-पुर्जे, स्टील, खिलौने और कंप्यूटर उपकरण आयात करता है। दूसरी ओर भारत चीन को लोहा, पेट्रोलियम पदार्थ, इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक केमिकल्स, मसाले, चमड़ा, कपड़ा, समुद्री खाद्य पदार्थ और अरंडी का तेल निर्यात करता है। इन उत्पादों में भारत की गुणवत्ता और उत्पादन लागत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी है, फिर भी आयात अधिक और निर्यात सीमित क्यों है?
—-=टैरिफ असमानता
इस असंतुलन का एक प्रमुख कारण चीन द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए जाने वाले भारी टैरिफ हैं। चीन भारतीय वस्तुओं पर औसतन 26% टैरिफ लगाता है जबकि भारत ने कई चीनी वस्तुओं पर शून्य से लेकर केवल 10-15% तक ही टैरिफ लगाए हैं। कुछ वस्तुओं पर जैसे इलेक्ट्रॉनिक आइटम और खिलौने पर भारत में टैरिफ बहुत कम है या लगभग शून्य है, जबकि ये वही वस्तुएं हैं जिनका चीन से भारी मात्रा में आयात किया जा रहा है।
इसका अर्थ है कि भारत चीन की सस्ती और अक्सर कम गुणवत्ता वाली वस्तुओं के लिए अपने बाज़ार के दरवाजे खोल रहा है जबकि चीन भारतीय वस्तुओं को रोकने के लिए उच्च टैरिफ का प्रयोग कर रहा है।
—-जीएसटी बनाम वैट: कर प्रणाली का फर्क
भारत में लागू वस्तु एवं सेवा कर (GST) कई स्लैब में विभाजित है—5%, 12%, 18%, और 28%—जबकि चीन में 13% वैट की एकरूप व्यवस्था है। भारत में जीएसटी दरें कई आवश्यक वस्तुओं और निर्यात उत्पादों पर भी अधिक हैं, जिससे निर्यातकों पर कर का भार बढ़ता है। इससे भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती है और वैश्विक बाजारों में चीनी उत्पादों को बढ़त मिलती है।
यदि भारत अपने निर्यातकों को राहत देना चाहता है, तो उसे जीएसटी दरों में कमी और रिफंड प्रक्रिया को सरल और तेज बनाना होगा। साथ ही, चीन से आयातित वस्तुओं पर वस्तु विशेष आधारित टैरिफ को बढ़ाना जरूरी है।
—मुद्रा असमानता का प्रभाव
एक और बड़ा मुद्दा है मुद्रा असंतुलन। एक चीनी युआन की कीमत लगभग 11 भारतीय रुपये के बराबर है। इसका मतलब है कि चीन को भारत से सस्ती वस्तुएं खरीदना अधिक फायदेमंद है, जबकि भारत को चीनी वस्तुएं आयात करना अपेक्षाकृत महंगा पड़ता है, लेकिन फिर भी भारत में चीन का माल भारी मात्रा में बिकता है क्योंकि उसका उत्पादन मूल्य बहुत कम होता है। इससे भारत की घरेलू उद्योगों पर विपरीत असर पड़ता है।
—आत्मनिर्भर भारत की चुनौती
भारत सरकार ने “आत्मनिर्भर भारत” का नारा दिया है, लेकिन अगर जमीनी स्तर पर देखें तो चीन से आयात पर निर्भरता अभी भी बहुत अधिक है। चाहे वह मोबाइल फ़ोन हो, टेलीकॉम उपकरण, सौर पैनल, खिलौने या मशीनरी, चीन की पकड़ भारत के खुदरा और औद्योगिक बाजार में बहुत मजबूत है।
यदि भारत को वास्तव में आत्मनिर्भर बनना है तो उसे निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
- चीन से आयात पर कम से कम 50% टैरिफ लागू करना, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स, खिलौने और लो-टेक मशीनों पर।
- भारत से निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए जीएसटी दरों में कमी और सब्सिडी/इंसेंटिव देना।
- स्वदेशी उद्योगों को तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करना जिससे वे चीन की गुणवत्ता और कीमत से मुकाबला कर सकें।
- बॉयकॉट चाइनीज प्रोडक्ट्स जैसे अभियानों को केवल भावनात्मक नहीं बल्कि नीतिगत समर्थन देना।
- भारत-चीन व्यापार की समीक्षा करते हुए सहमति आधारित व्यापार संतुलन नीति अपनाना।
-निष्कर्ष
भारत को अब यह समझना होगा कि केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि रणनीतिक हित भी महत्त्वपूर्ण हैं। जब एक देश हमारी सीमाओं पर लगातार तनाव पैदा कर रहा है, तब हम उस पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं रह सकते। भारत को चीन के साथ अपने व्यापार संबंधों की समीक्षा करनी होगी, और अपनी नीतियों में बदलाव लाकर स्थायी आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ना होगा। इसके लिए केवल सरकार ही नहीं, उद्योग जगत और उपभोक्ताओं की भी भागीदारी जरूरी है।